Sushma Gupta's Blog

Writings and Thoughts of Sushma Gupta

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Sushma Gupta


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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक विचार-

Posted On: 8 Mar, 2015  
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”नूतन वर्ष” के स्वागत में एक ‘क्षणिका’.

Posted On: 1 Jan, 2015  
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”हम देश के नन्हें सेनानी”

Posted On: 14 Aug, 2014  
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”श्री राम वंदना”

Posted On: 20 Jul, 2014  
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क्षणिका -नदी

Posted On: 14 Jul, 2014  
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”शौक ए मौहब्बत”[ ग़ज़ल ]

Posted On: 8 Jul, 2014  
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[ सुविचार ]

Posted On: 24 Jun, 2014  
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”दर्दे- दिल आँखों से बहता था”

Posted On: 20 Jun, 2014  
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Hindi Sahitya Others social issues कविता में

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बिल्लो रानी [एक बाल कविता]

Posted On: 17 Jun, 2014  
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Celebrity Writer Hindi Sahitya Others कविता में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: amarsin amarsin

और आज देश में जो बड़े-बड़े सफेदपोश अपराधी हैं ,जिन्होंने हमारे देश की समृद्धि की जड़ो को ही हिला दिया है, उनको क्यों सरेआम नहीं पीटते ? बात कुछ-कुछ समझ आने पर उन्होंने उस बालक को तो छोड़ दिया, पर यह बात वर्षों पुरानी होने पर भी आज भी आँखों के समक्ष आती है, जी यही हालात हैं सुषमा जी पुलिस वाले पहले तो अपने थाने के अपराध ग्राफ को नीचे रखने के लिए प्राथमिकी दर्ज नहीं करते आप ज्यादा होशियार और पढ़ाई लिखाई की बात किये तो इतना तंग करेंगे की लोग भाग ही जाए चोरी हो तो भोले भाले को पकड़ लेंगे या मुर्गी चोर को शातिर अपराधी ..आप जैसे नागरिक की जरुरत बहुत है ..गरीब ही व्यथा झेलने को पैदा हुए हैं ? सुन्दर संस्मरण .. भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

सुंदर प्रस्तुई इस मुद्दे पर मेरी कविता पड़ने का कस्ट करें p>केदार मेँ मची ये कैसी हाहाकार है कुदरत प्रतिकार करने को खुद लाचार है ऐ मानव तेरे करम वनोँ का किया दोहन कुदरत ने उठा कदम तोडा तेरा भरम कुदरत खुद ही तैयार करने को संहार है केदार मेँ . . . . . . पर्वतोँ को काट दिया वृक्षोँ को छाँट दिया जंगलोँ मेँ लगा के आग खेतोँ मेँ बाँट दिया घमंड तेरा चूर करने को कुदरत तैयार है केदार मेँ . . . . . . नदियोँ का रुख मोडा प्राकृतिक प्रवाह तोडा सारे शहर की गन्द को उस नदी मेँ ही छोडा उसी नदी ने आज दिया तुझको ललकार है केदार मेँ . . . . . . ए मानव तू बदल घर से तू निकल चेतावनी थी ये प्रथम अब भी जा संभल सब प्रदूषणोँ को बन्द कर आरम्भ कर वृक्षारोपण पृकृति तुझ से कर रही यही पुकार है केदार मेँ . . . . . . jagranforum http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2013/06/20/केदार-मेँ-मची-ये-कैसी-हाहा/

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

अब न कोई फुटपाथ पर पले चरित्र व संस्कारों में सदा आगे जहाँ में स्वदेश का सम्मान वढे चारों दिशा खुशियों की हरियाली हो झूमती बालें, फसलें भी लहराती हो अब न दिखे नंगा-भूखा इन्सा कोई भूखा न सोए कोई सबका पेट भरे अब बचपन खुशहाली में सबका बीते उदासी न हो हरमुख पे मुस्कान खिले माँगने की बुरी आदत से हर कोई बचे मेरे देश का युवा मेहनत से आगे बढ़ें भारत की बेटी पग-पग उन्नति करें बेटा-बेटी मुल्क में एकसमान ही रहें आधुनिकता की अंधी-दौड़ से दूर रहें कुरीतीयो, कुसंस्कारो से कोसो दूर रहें बहुत सुन्दर कल्पना कर डाली है आपने अपने देश की आदरणीय सुषमा जी , लेकिन हकीकत के धरातल पर बहुत कुछ उल्टा होता दीख रहा है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

अब जब खुल चुकी पोल सभीकी, तो संसद में ही सबने क़ानून बनाया आर.टी आई से बहार होंगे राजनेता यह बिल अब स्वीकृत कर दिखाया महंगाई से आक्रांत जनता पूछती ‘हाय’ ये कैसा भ्रष्टाचार देश में आ गया खिली-खिली सी इस सुख की धूप में फिर क्यों अंधकार है अब छा गया जब इस देश के रखबाले ही चोर, डांकू, घोटालेबाज, जाल-साज़ बन गये पता भी न चला कब माफियायों से मिल, दीमक बन देश को ही चाट गये फलते-फूलते इस देश को इन चंद भ्रष्टाचारियों ने ‘भ्रष्ट-तंत्र’ आज बना दिया बोटों की ही खातिर देश की ‘धरोहर’ को नीलामकर निज जीत पे लुटा दिया भ्रष्टाचार की ये नाकाम ‘दुश्वारियाँ’ अब नहीं चलेंगीं… नहीं चलेंगीं …नहीं चलेंगी …. ”भारत छोड़ों भ्रष्टाचारियों”, ये कलुषित कारगुजारियाँ अब नहीं चलेंगीं बहुत सटीक और सुन्दर शब्द आदरणीय सुषमा जी

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

पर हताशा इस बात की है कि अब भी मानव स्वयं को दोषी न मानकर प्रकृति को ही इसका ज़िम्मेदार मानता है, नासमझी में इस पवित्र -गंगा को भी एकमात्र त्रासदी का कारण मान रहा है,जबकि उसने पुराणों व प्राचीन ग्रंथो में पढ़ा होगा कि गंगा को पृथ्वी पर आने के पूर्व उसके प्रचंड वेग व तीव्रता को नियंत्रित कर हेतु स्वयं भगवान शंकर ने उसे अपनी जटाओं में धारण किया था, जबकि इसी शिव-तत्व का वास पृथ्वी के कण-कण में है, इसीलिए मानों यह वृक्ष ही शिव की जटा भी इन्हीं वृक्षों के रूप में समस्त सृष्टि में दृष्टि-गोचर हैं, परंतु अज्ञानता-वश व लालच के कारण ‘शिव’ की इन वृक्ष-रूपी जटाओं को ही काटना शुरू कर दिया, तो फिर गंगा का वेग कैसे शांत रह पाता,और फिर यही अत्यंत क्रोधित अशांत-गंगा का वेग आपदा बनकर कुछ पलों में ही उन आशियानों व कितनी ही जानो को अपने साथ ले गया … प्रकृति अपने हिसाब से बदला लेती है , बिना किसी आहट के ! ये दिखा भी है कई बार लेकिन हम भूल जाते हैं ! सटीक विषय पर बढ़िया लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat




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