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”प्रकृति की उदारता” [लघु-कथा]

Posted On: 27 Mar, 2014 Others में

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सुहासिनी और उसके पति राजेश के घर के आगे एक सुंदर बगीचा था, जिसे उन दोनों ने भाँति- भाँति के फलों और फूलों के द्वारा एक भव्य रूप दिया था,उनके इस छोटे से बगीचे में आम,अमरूद ,केले, पपीते, जामुन,सेव, अनार आदि के छायादार पेडो के साथ ही गुलाब ,गेन्दा,चमेली,गुल्मोहर ,पलाश,चाँदनी,सूरजमुखी एवं अनेको प्रजाति के रंग-बिरंगे फूलों से सजी क्यारीओं को देखकर सभी मंत्र-मुग्ध हो जाते,इसीकारण बहाँ हर समय बालको का शोर व पक्षी आदि का कलरव गूँजता था,तो कभी कोयल की कूहु-कूहु की आवाज़,इस खुशनुमा वातावरण में सुहासिनी उन नन्हें चहकते फरिस्तो को अपने पास बुलाकर उन्हें उनकी ही पसंद के फल व फूल देती ,सभी बालक खुश थे,पर जैसे ही यह बात उसके पति को पता चली, तो बह अत्यंत ही क्रोधित हुआ,अब बह बगीचे में उनके आने पर उन्हें मारकर भगा देता था…और तो और पेड़ों पर कलरव करते पक्षियों को भी गुलेर व डंडे से भगाता था, इसके लिए सुहासिनी ने उसे समझाने के उद्देश्य से कहा कि इस बगीचे में हमने तो मात्र बीज ही बोए है,पर देने बाली तो यह महान प्रकृति ही है जिसे हम नहीं जानते कि बह हमें कितना देगी? परंतु सुहासिनी की बात का उसपर बिपरीत असर हुआ,और फिर उसने बगीचें में सुहासिनी के प्रवेश पर भी रोक लगा दी ,अब हर समय बह बगीचे में नज़र रखने के सिवाय कोई भी कार्य न करता,और सदैव यही कहता कि इस बगीचे पर केवल मेरा ही अधिकार है,और स्वयं को मालिक कहकर भी उसकी सही देख-भाल नहीं करता, जिससे कुछ दिनों बाद ही बगीचे के सभी फल-फूल समाप्त हो गये ,बगीचा एक बिराने में बदल गया..अब न बहाँ हरे-भरे पेड़ थे और न सुंदर- सुंदर फूल ..बिना नन्हे-मुन्नो की किल्कारीभरी आवाज़ो और चिड़ियों के कलरव अब बही बगीचा शमशान लगता था… तो मित्रों ,सुहासिनी का पति अब यह अवश्य ही जान गया होगा कि ”प्रकृति भी तभी उदार होती है, जब हम स्वयं उदार होते हैं ”….

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
April 1, 2014

वासत्व में देने वाली प्रकृति (ईश्वर) ही है, हम उसे जितना देते हैं, उसे वो लाखों गुना करके लोटा देती है! सुंदर कथा! आदरणीया सुषमा जी !

    Sushma Gupta के द्वारा
    April 1, 2014

    आपने बिलकुल सही कहा संजय जी, काश; इस तथ्य को सभी लोग समझ पाते तो फिर हमारे अंदर दूसरों के प्रति भी अपनत्व पलता..ठीक इन्हीं फूलो सा कोमल.. प्रतिक्रिया हेतु आपका बहुत आभार..

    Sushma Gupta के द्वारा
    March 31, 2014

    सही कहा आपने कुछ व्यस्थता के कारण ही ऐसा हुआ ,अब तो आती ही रहूंगी ,अपनी छोटी -मोटी रचनाओं के साथ ..

Sushma Gupta के द्वारा
March 28, 2014

शालिनी जी नमस्कार,प्रतिक्रिया हेतु आपका अति आभार , शालिनी जी, बगीचे में पड़े फूल अवश्य ही मुरझाएं ,यदि इन नशवर फल-फूलों को किसी के चहरे की मुस्कान लाने में दे दिया जाए ,तो सच मानिये देने बाले को बदले में असीम ख़ुशी मिलती है, जो अनमोल है …

March 27, 2014

सुन्दर भावपूर्ण लघु कथा .लेकिन सुषमा जी हम स्वयं बगीचा रखते हैं किन्तु फूल देखना और वह भी उसके पौधे पर भाता है किसी को देना नहीं सुहासिनी के पति की यह गलती रही कि उसने देखभाल नहीं की .


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