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”दर्दे- दिल आँखों से बहता था”

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तूफाँ में घिर जो बचा सके ना अपनी जिंदगानी
अब रह गई फ़िजा में उनकी जांबाजी की कहानी
आपदा में देके अपनी जान बचाली कितनी जानें
वो मेरे देश के थे ज़ावाज मतबाले वीर सेनानी

हर शह में खामोशी, घर-घर मातम की परछाई
कल की सुहागिन की आँखें लहू के आंसू – नहाईं
धूमिल हुए सब सपने, याद मिटी ना सजना की
दर्दे- दिल आँखों से बहता था, सांसों पे बन आई

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
June 23, 2014

सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

    Sushma Gupta के द्वारा
    June 24, 2014

    मदन मोहन जी, काफी अंतराल के बाद ,आज आपको ब्लॉग पर देखकर बहुत सुखद लगा , साथ ही एक सुन्दर व् सार्थक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार …

Sushma Gupta के द्वारा
June 22, 2014

शोभा जी, आपने रचना के मर्म को छूकर एक सार्थक प्रतिक्रिया के साथ ही ब्लॉग पर आकर शोभा प्रदान की , इस हेतु मैं आपकी ह्रदय से आभारी हूँ …

Shobha के द्वारा
June 21, 2014

अति सुन्दर मार्मिक भाव कल की सुहागिन की आँखे लहू के आसूं -नहाई बहूत ही भाव पूर्ण सुषमा जी शोभा

Sushma Gupta के द्वारा
June 21, 2014

निर्मला जी नमस्कार, मैं तो बस यही चाहती हूँ कि देश के हर शहीद के घर-परिवार का दर्द हम समझें और उनकी हर संभव सहायता करें ,क्योंकि वे भी हमारे लिए ही अपने प्राणो की वाजी लगा देते हैं ..आपका सार्थक प्रतिक्रिया हेतु आभार..

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 20, 2014

शहीद की पत्नी का दर्द बखूबी वयां किया है आपने ,मार्मिक अभिव्यक्ति ,सुषमा जी सादर साधुबाद .


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