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क्षणिका -नदी

Posted On: 14 Jul, 2014 Others में

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नदी की इसी धार सा
वहता जाता यह जीवन
बिन खेवनहार भी खेता
तन की इस नैया को
मुश्किलों की मझधार में
लड़ता तूफानी मौजों से
होता ना हताश कभी..
पतवार से उम्मीदों की
खे रहा अवाध गति से
इस पार से उस पार तक
होगा मिलन बहारों से भी
गर्दिशों में चाहत उसे तो
गम में डूवों को बचाने की
वज़ह है बस जीने की

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
July 15, 2014

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ-गर्दिशों में चाहत उसे तो गम में डूवों को बचाने की वज़ह है बस जीने की ! एक बहुत अच्छी रचना के लिए बहुत बहुत बधाई !

    Sushma Gupta के द्वारा
    July 16, 2014

    हार्दिक आभार सदगुरूजी,एक इतनी सुन्दर व् सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु..

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 14, 2014

गम में डूवों को बचाने की वज़ह है बस जीने की,एक सम्वेदन शील ह्रदय की सुंदर भावनाओं की अभिव्यक्ति .7

    Sushma Gupta के द्वारा
    July 16, 2014

    हार्दिक आभार निर्मला जी, सुन्दर भाव-पूर्ण प्रतिक्रिया हेतु..

pkdubey के द्वारा
July 14, 2014

अच्छा जीवन दर्शन आदरणीया.

    Sushma Gupta के द्वारा
    July 16, 2014

    हार्दिक आभार पी.के.दूबे जी..सुन्दर सारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु..


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